उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में चर्चों पर क्यों हो रहे हैं हमलेः ग्राउंड रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाक़ों में ईसाइयों और दक्षिणपंथी हिन्दू संगठनों के बीच तनाव बढ़ रहा है. हिंसा, एक दूसरे के ख़िलाफ़ शक और नफ़रत की दीवारें ऊंची उठती जा रही हैं.
ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन के आरोपों और ईसाईओं की तेज़ी से बढ़ती आबादी पर चिंता के बीच ईसाई पादरियों और गिरजाघरों पर हमले आम होते जा रहे हैं.
स्थानीय पुलिस के ख़िलाफ़ पक्षपात के इलज़ाम लगाए जा रहे हैं और ईसाई धार्मिक लीडरों की गिरफ़्तारी लगभग रोज़ की घटना बनती जा रही है. हाल ही में रायबरेली में दो पादिरयों - आज़ाद यादव और कड़ाही रावत - की गिरफ़्तारी हुई.
स्थानीय पुलिस के अनुसार उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन करने का इलज़ाम था.
इसी तरह 4 जुलाई को महाराजगंज में जितेंद्र साहनी नाम के एक पादरी के परिवार वालों पर धर्म प्रचार के कारण हमला किया गया जिसमें कुछ लोग घायल हो गए.
अगर आप पूर्वांचल के जौनपुर, रॉबर्ट्सगंज, वाराणसी, गोरखपुर और रायबरेली जैसे ज़िलों के ग्रामीण इलाक़ों में जाएँ तो माहौल में भय और तनाव महसूस कर सकते हैं.
इलाक़े के लोगों का मानना है कि अगर इस तनाव को कम नहीं किया गया तो आगे हिंसक घटनाएं अधिक बढ़ेंगी.
ये तनाव जौनपुर के ग्रामीण इलाक़ों में पिछले साल सितंबर में बड़े पैमाने पर हिंसा के रूप में सामने आ भी चुका है.
वहाँ कई चर्चों पर हमले हुए और पादरियों को गिरफ़्तार किया गया. इलाक़े के अधिकतर चर्च बंद करवा दिए गए.
मामला इतना गंभीर था कि बंद कराए गए गिरजाघरों को दुबारा खुलवाने के लिए अमरीकी दूतावास को आगे आना पड़ा.
हमलों के कुछ महीने बाद यानी दिसंबर में राष्ट्रपति ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी नॉक्स थेम्स के नेतृत्व में अमरीकी दूतावास एक प्रतिनिधिमंडल उत्तर प्रदेश सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मोहसिन रज़ा से मिला और बंद इबादत गाहों को दोबारा खुलवाने का आग्रह किया.
मोहसिन रज़ा इस मीटिंग की पुष्टि करते हुए कहते हैं, "पिछले साल दिसंबर के दूसरे हफ़्ते में अमरीकी दूतावास का एक प्रतिनिधिमंडल आया था. उन्होंने गिरजाघरों की एक लिस्ट दी थी जिनमें से अधिकतर पूर्वी उत्तर प्रदेश में जौनपुर, सुल्तानपुर, आज़मगढ़ इत्यादि में थे. मैंने ज़िला अधिकारियों को फ़ोन करके इनकी शिकायतें बता दी थीं".
मोहसिन रज़ा ने दावा किया कि अधिकांश चर्चों को फिर से खोल दिया गया है.
उन्होंने कहा, "मैंने प्रतिनिधिमंडल को इसकी ख़बर भी भिजवा दी थी. मामले को हल कर दिया गया था".
मोहसिन रज़ा ने इसे अमरीकी सरकार की तरफ़ से हस्तक्षेप की तरह से नहीं देखा. उनके अनुसार विदेश में भारतीय मूल के लोगों को कुछ परेशानी होती है तो भारत सरकार भी स्थानीय प्रशासन से शिकायत करती है.
दोबारा खोले गए गिरजाघरों में से एक जौनपुर के कुदुपुर बक्ची गाँव में है. इसके पादरी राजिंदर चौहान को दिसंबर में 15 दिनों के लिए जेल जाना पड़ा था.
वो कहते हैं, "हिंदू परिवार के लोग प्रशासन के साथ मिल कर हमें तंग करते हैं. हमारे चर्च को पिछले साल दिसंबर में पुलिस ने बंद कर दिया था और हमें 25 दिसंबर को गिरफ्तार कर लिया था"
उनका चर्च कुछ सप्ताह पहले ही दोबारा खुला है. उनका कहना था कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद उनका चर्च दोबारा खोल दिया गया.
वे कहते हैं, "अब यहाँ कोई तंग करने नहीं आता".
हिरासत में पादरी
अमरीका-स्थित धार्मिक स्वतंत्रता की क़ानूनी तौर पर रक्षा करने वाली वैश्विक संस्था एलायंस डिफ़ेंडिंग फ़्रीडम (एडीएफ़) के अनुसार पिछले साल सितंबर से अब तक ईसाई मज़हब के मानने वालों के ख़िलाफ़ 125 से 130 केस दर्ज किए गए हैं.
110 पादरियों को हिरासत में लिया गया है जिनमे से 65 के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जा रही है. उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन में शामिल होना सबसे गंभीर आरोप है.
स्थानीय पुलिस के पास हमलों और गिरफ्तारियों के आंकड़ें नहीं थे लेकिन पुलिस अधिकारियों ने कहा कि ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन की शिकायतें उन्हें अक्सर मिलती हैं.
भारी शरीर वाले पादरी राजिंदर चौहान ऊंचे क़द के हैं. जब मैं उनके गिरजा घर के अंदर गया तो वहां एक प्रार्थना सभा चल रही थी जिसमे महिलायें अधिक संख्या में थीं. सभा में अचानक से जोश उस समय आया जब पादरी राजिंदर चौहान अंदर आये. लोगों ने हाथ ऊपर करके, तालियां बजाकर और ज़ोरदार आवाज़ में उनके साथ प्रार्थना की पंक्तियों को गाना शुरू कर दिया. ऐसा लगा लोग सही में उनके बड़े भक्त हैं. इनमें से अधिकतर ऐसे लोग थे जो पिछले कुछ सालों में ईसाई धर्म में आए थे.
चौहान कहते हैं, "यहाँ हर रविवार को लगभग 2500 लोग प्रार्थना सभा में आते हैं. उन्हें चंगाई मिलती है, शांति मिलती है और वो प्रभु (ईसा मसीह) के गुण गाने लगते हैं "
लेकिन अगर एक तरफ़ पुराने चर्च दोबारा खोले जा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ अन्य गिरजाघर बंद किए जा रहे हैं.
रॉबर्ट्सगंज के एक छोटे गिरजा घर के पादरी नरेंद्र कुमार ने अपनी ज़मीन पर एक बड़ा हॉल बनवाया था जिसे वो चर्च की तरह से इस्तेमाल कर रहे थे.
उन्होंने कहा, "हिंदुत्व परिवार के कार्यकर्ता और पुलिस वाले आये और पूछा चर्च चलाने का लाइसेंस है? जब मैंने कहा कि प्रार्थना सभाएं चलाने के लिए इजाज़त की ज़रुरत नहीं होती तो उन्होंने हमारे चर्च को बंद करवा दिया".
उनके घरनुमा चर्च को बंद हुए कुछ महीने हो गए हैं लेकिन ये दोबारा नहीं खुल पाया है. नरेंद्र कुमार ने पुलिस और प्रशासन के ख़िलाफ़ पक्षपात होने की बात कही. जब हमने स्थानीय पुलिस के सामने ये बात रखी तो कहा गया कि उनके सामने चर्च बंद होने की कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है.
हिन्दू संगठनों का कहना है कि इलाक़े में जारी तनाव का मुख्य कारण धर्म परिवर्तन है. उनके अनुसार हिन्दुओं को पैसे देकर, बीमारों को स्वस्थ्य करने का दावा करके या ज़बरदस्ती करके ईसाई बनाया जा रहा है.
हर्ष अग्रवाल रॉबर्ट्सगंज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख हैं. उनका कहना है कि ईसाई पादरी हिन्दू धर्म को बुरा-भला कहते हैं और चमत्कार करके बीमारों को ठीक करने का दावा करते हैं जिससे कम पढ़े-लिखे लोगों में अंधविश्वास पैदा होता है
हर्ष अग्रवाल कहते हैं, "गाँवों में नए चर्च हर रोज़ बनाए जा रहे हैं. हम इसका विरोध नहीं करते हैं. हम ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन के ख़िलाफ़ हैं. हम इस बात का विरोध करते हैं कि हिन्दू धर्म को नीचे दिखा कर ईसाई धर्म का प्रचार किया जा रहा है".
ईसाई धार्मिक लीडर और प्रचारक ज़बरदस्ती या पैसे और नौकरियों का लालच देकर धर्म परिवर्तन के आरोप को ग़लत मानते हैं.
रविकांत दुबे एक चर्च के पादरी हैं. वो बताते हैं कि ग्रामीण इलाक़ों में हिन्दू धर्म परिवर्तन करके ईसाई मज़हब क्यों अपना रहे हैं.
वो कहते हैं, "बीमार लोग जब सब जगह से थक कर कलीसा में आते हैं तो उनको यहाँ शांति मिलती है, उन्हें पैसा नहीं देना पड़ता. हम उनकी सेहत के लिए ईसा मसीह के नाम से प्रार्थना करते हैं. हम कहते हैं प्रभु इन्हें आप चंगाई दीजिए. जब उन्हें चंगाई मिलती है, शांति मिलती है तो वो प्रभु ईसा मसीह के पीछे चलना शुरू कर देते हैं".
इस क्षेत्र में ईसाईयों की आबादी या उनके चर्च की संख्या के आँकड़े किसी के पास नहीं हैं. लेकिन ये कहना सही होगा कि चर्च और ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है.
ये लोग पारंपरिक ईसाई चर्च से नहीं जुड़े हैं. ये केवल ईसा मसीह को मानते हैं, उनके बुतों की पूजा नहीं करते.
धर्म परिवर्तन के बाद भी वो अपना हिन्दू नाम नहीं बदलते. एक अनुमान के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में इनकी संख्या लाखों में है.
हिंदू देश की 130 करोड़ जनसंख्या का लगभग 80 प्रतिशत हैं जबकि ईसाई इसका केवल दो प्रतिशत.
कई पादरियों ने हमें ये बताया कि कट्टरवादी हिन्दू संगठन "ग़ैर ज़रूरी असुरक्षा" के कारण उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन का "झूठा" इलज़ाम लगाते हैं.
इस पर आरएसएस के हर्ष अग्रवाल कहते हैं, "हिन्दुओं की आबादी बड़ी ज़रूर है लेकिन अपने धर्म का अगर एक व्यक्ति भी दूसरे धर्म में प्रवेश करता है तो दुःख तो होता ही है".
ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन के आरोपों और ईसाईओं की तेज़ी से बढ़ती आबादी पर चिंता के बीच ईसाई पादरियों और गिरजाघरों पर हमले आम होते जा रहे हैं.
स्थानीय पुलिस के ख़िलाफ़ पक्षपात के इलज़ाम लगाए जा रहे हैं और ईसाई धार्मिक लीडरों की गिरफ़्तारी लगभग रोज़ की घटना बनती जा रही है. हाल ही में रायबरेली में दो पादिरयों - आज़ाद यादव और कड़ाही रावत - की गिरफ़्तारी हुई.
स्थानीय पुलिस के अनुसार उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन करने का इलज़ाम था.
इसी तरह 4 जुलाई को महाराजगंज में जितेंद्र साहनी नाम के एक पादरी के परिवार वालों पर धर्म प्रचार के कारण हमला किया गया जिसमें कुछ लोग घायल हो गए.
अगर आप पूर्वांचल के जौनपुर, रॉबर्ट्सगंज, वाराणसी, गोरखपुर और रायबरेली जैसे ज़िलों के ग्रामीण इलाक़ों में जाएँ तो माहौल में भय और तनाव महसूस कर सकते हैं.
इलाक़े के लोगों का मानना है कि अगर इस तनाव को कम नहीं किया गया तो आगे हिंसक घटनाएं अधिक बढ़ेंगी.
ये तनाव जौनपुर के ग्रामीण इलाक़ों में पिछले साल सितंबर में बड़े पैमाने पर हिंसा के रूप में सामने आ भी चुका है.
वहाँ कई चर्चों पर हमले हुए और पादरियों को गिरफ़्तार किया गया. इलाक़े के अधिकतर चर्च बंद करवा दिए गए.
मामला इतना गंभीर था कि बंद कराए गए गिरजाघरों को दुबारा खुलवाने के लिए अमरीकी दूतावास को आगे आना पड़ा.
हमलों के कुछ महीने बाद यानी दिसंबर में राष्ट्रपति ट्रंप प्रशासन के एक अधिकारी नॉक्स थेम्स के नेतृत्व में अमरीकी दूतावास एक प्रतिनिधिमंडल उत्तर प्रदेश सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मोहसिन रज़ा से मिला और बंद इबादत गाहों को दोबारा खुलवाने का आग्रह किया.
मोहसिन रज़ा इस मीटिंग की पुष्टि करते हुए कहते हैं, "पिछले साल दिसंबर के दूसरे हफ़्ते में अमरीकी दूतावास का एक प्रतिनिधिमंडल आया था. उन्होंने गिरजाघरों की एक लिस्ट दी थी जिनमें से अधिकतर पूर्वी उत्तर प्रदेश में जौनपुर, सुल्तानपुर, आज़मगढ़ इत्यादि में थे. मैंने ज़िला अधिकारियों को फ़ोन करके इनकी शिकायतें बता दी थीं".
मोहसिन रज़ा ने दावा किया कि अधिकांश चर्चों को फिर से खोल दिया गया है.
उन्होंने कहा, "मैंने प्रतिनिधिमंडल को इसकी ख़बर भी भिजवा दी थी. मामले को हल कर दिया गया था".
मोहसिन रज़ा ने इसे अमरीकी सरकार की तरफ़ से हस्तक्षेप की तरह से नहीं देखा. उनके अनुसार विदेश में भारतीय मूल के लोगों को कुछ परेशानी होती है तो भारत सरकार भी स्थानीय प्रशासन से शिकायत करती है.
दोबारा खोले गए गिरजाघरों में से एक जौनपुर के कुदुपुर बक्ची गाँव में है. इसके पादरी राजिंदर चौहान को दिसंबर में 15 दिनों के लिए जेल जाना पड़ा था.
वो कहते हैं, "हिंदू परिवार के लोग प्रशासन के साथ मिल कर हमें तंग करते हैं. हमारे चर्च को पिछले साल दिसंबर में पुलिस ने बंद कर दिया था और हमें 25 दिसंबर को गिरफ्तार कर लिया था"
उनका चर्च कुछ सप्ताह पहले ही दोबारा खुला है. उनका कहना था कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद उनका चर्च दोबारा खोल दिया गया.
वे कहते हैं, "अब यहाँ कोई तंग करने नहीं आता".
हिरासत में पादरी
अमरीका-स्थित धार्मिक स्वतंत्रता की क़ानूनी तौर पर रक्षा करने वाली वैश्विक संस्था एलायंस डिफ़ेंडिंग फ़्रीडम (एडीएफ़) के अनुसार पिछले साल सितंबर से अब तक ईसाई मज़हब के मानने वालों के ख़िलाफ़ 125 से 130 केस दर्ज किए गए हैं.
110 पादरियों को हिरासत में लिया गया है जिनमे से 65 के ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की जा रही है. उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन में शामिल होना सबसे गंभीर आरोप है.
स्थानीय पुलिस के पास हमलों और गिरफ्तारियों के आंकड़ें नहीं थे लेकिन पुलिस अधिकारियों ने कहा कि ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन की शिकायतें उन्हें अक्सर मिलती हैं.
भारी शरीर वाले पादरी राजिंदर चौहान ऊंचे क़द के हैं. जब मैं उनके गिरजा घर के अंदर गया तो वहां एक प्रार्थना सभा चल रही थी जिसमे महिलायें अधिक संख्या में थीं. सभा में अचानक से जोश उस समय आया जब पादरी राजिंदर चौहान अंदर आये. लोगों ने हाथ ऊपर करके, तालियां बजाकर और ज़ोरदार आवाज़ में उनके साथ प्रार्थना की पंक्तियों को गाना शुरू कर दिया. ऐसा लगा लोग सही में उनके बड़े भक्त हैं. इनमें से अधिकतर ऐसे लोग थे जो पिछले कुछ सालों में ईसाई धर्म में आए थे.
चौहान कहते हैं, "यहाँ हर रविवार को लगभग 2500 लोग प्रार्थना सभा में आते हैं. उन्हें चंगाई मिलती है, शांति मिलती है और वो प्रभु (ईसा मसीह) के गुण गाने लगते हैं "
लेकिन अगर एक तरफ़ पुराने चर्च दोबारा खोले जा रहे हैं तो दूसरी तरफ़ अन्य गिरजाघर बंद किए जा रहे हैं.
रॉबर्ट्सगंज के एक छोटे गिरजा घर के पादरी नरेंद्र कुमार ने अपनी ज़मीन पर एक बड़ा हॉल बनवाया था जिसे वो चर्च की तरह से इस्तेमाल कर रहे थे.
उन्होंने कहा, "हिंदुत्व परिवार के कार्यकर्ता और पुलिस वाले आये और पूछा चर्च चलाने का लाइसेंस है? जब मैंने कहा कि प्रार्थना सभाएं चलाने के लिए इजाज़त की ज़रुरत नहीं होती तो उन्होंने हमारे चर्च को बंद करवा दिया".
उनके घरनुमा चर्च को बंद हुए कुछ महीने हो गए हैं लेकिन ये दोबारा नहीं खुल पाया है. नरेंद्र कुमार ने पुलिस और प्रशासन के ख़िलाफ़ पक्षपात होने की बात कही. जब हमने स्थानीय पुलिस के सामने ये बात रखी तो कहा गया कि उनके सामने चर्च बंद होने की कोई शिकायत दर्ज नहीं की गई है.
हिन्दू संगठनों का कहना है कि इलाक़े में जारी तनाव का मुख्य कारण धर्म परिवर्तन है. उनके अनुसार हिन्दुओं को पैसे देकर, बीमारों को स्वस्थ्य करने का दावा करके या ज़बरदस्ती करके ईसाई बनाया जा रहा है.
हर्ष अग्रवाल रॉबर्ट्सगंज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख हैं. उनका कहना है कि ईसाई पादरी हिन्दू धर्म को बुरा-भला कहते हैं और चमत्कार करके बीमारों को ठीक करने का दावा करते हैं जिससे कम पढ़े-लिखे लोगों में अंधविश्वास पैदा होता है
हर्ष अग्रवाल कहते हैं, "गाँवों में नए चर्च हर रोज़ बनाए जा रहे हैं. हम इसका विरोध नहीं करते हैं. हम ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन के ख़िलाफ़ हैं. हम इस बात का विरोध करते हैं कि हिन्दू धर्म को नीचे दिखा कर ईसाई धर्म का प्रचार किया जा रहा है".
ईसाई धार्मिक लीडर और प्रचारक ज़बरदस्ती या पैसे और नौकरियों का लालच देकर धर्म परिवर्तन के आरोप को ग़लत मानते हैं.
रविकांत दुबे एक चर्च के पादरी हैं. वो बताते हैं कि ग्रामीण इलाक़ों में हिन्दू धर्म परिवर्तन करके ईसाई मज़हब क्यों अपना रहे हैं.
वो कहते हैं, "बीमार लोग जब सब जगह से थक कर कलीसा में आते हैं तो उनको यहाँ शांति मिलती है, उन्हें पैसा नहीं देना पड़ता. हम उनकी सेहत के लिए ईसा मसीह के नाम से प्रार्थना करते हैं. हम कहते हैं प्रभु इन्हें आप चंगाई दीजिए. जब उन्हें चंगाई मिलती है, शांति मिलती है तो वो प्रभु ईसा मसीह के पीछे चलना शुरू कर देते हैं".
इस क्षेत्र में ईसाईयों की आबादी या उनके चर्च की संख्या के आँकड़े किसी के पास नहीं हैं. लेकिन ये कहना सही होगा कि चर्च और ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है.
ये लोग पारंपरिक ईसाई चर्च से नहीं जुड़े हैं. ये केवल ईसा मसीह को मानते हैं, उनके बुतों की पूजा नहीं करते.
धर्म परिवर्तन के बाद भी वो अपना हिन्दू नाम नहीं बदलते. एक अनुमान के अनुसार पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार में इनकी संख्या लाखों में है.
हिंदू देश की 130 करोड़ जनसंख्या का लगभग 80 प्रतिशत हैं जबकि ईसाई इसका केवल दो प्रतिशत.
कई पादरियों ने हमें ये बताया कि कट्टरवादी हिन्दू संगठन "ग़ैर ज़रूरी असुरक्षा" के कारण उनके ख़िलाफ़ ज़बरदस्ती धर्म परिवर्तन का "झूठा" इलज़ाम लगाते हैं.
इस पर आरएसएस के हर्ष अग्रवाल कहते हैं, "हिन्दुओं की आबादी बड़ी ज़रूर है लेकिन अपने धर्म का अगर एक व्यक्ति भी दूसरे धर्म में प्रवेश करता है तो दुःख तो होता ही है".
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